मेरी माँ

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मेरी माँ
माँ तुझपे मैं लिख सकूं वो शब्द कहाँ से लाऊँ ?
तेरे अपरिमित प्यार के आगे करबद्ध मैं हो जाऊँ ।

तेरी ही मैं परछाईं हूँ माँ, तेरी ही मैं जाई हूँ,
मेरे नाज नखरों को मिली जहाँ स्नेह की छाया,
माँ मैं तेरी ही अंश, तेरे वात्सल्य की शहनाई हूँ।
जागती तू कितनी रातों को मेरे संग संग,
इम्तिहान रहता जब मेरा नींद तू भी गँवाती प्रतिपल।
तेरी ‘नन्हीं कली’ वाली लोरी याद कर आसक्त मैं हो जाऊँ,
तेरे अपरिमित प्यार के आगे करबद्ध मैं हो जाऊँ …
मेरे नीरव मन को शब्द दिया तुमने,
मेरी लेखनी को साकार किया तुमने,
आज भी विकल जब होती हूँ,
थाम तेरा हाथ सकल मैं होती हूँ।
मिलना कम हो गया ज़िम्मेदारियों के बीच,
पर याद तुझे कर अनगढ़ मन को लयबद्ध मैं कर जाऊँ,
तेरे अपरिमित प्यार के आगे करबद्ध मैं हो जाऊँ …

रीमा सिन्हा

लखनऊ -उत्तर प्रदेश

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