राजनीति में ऐसे भाव होना बेहद ज़रूरी

केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के प्रमुख रामविलास पासवान का लंबी बीमारी के चलते बीते गुरुवार शाम निधन हो गया। उनके इस आकस्मिक निधन से जहां पूरे देश में शोक की लहर व्याप्त है। वहीं भारतीय राजनीति के बड़े हस्ताक्षर के रूप में जाने जाने वाले पासवान के निधन से राजनीति से जुड़े हर दिग्गज़ राजनेता फिर चाहे वो पक्ष हो या विपक्ष सभी ने ट्वीट के माध्यम से गहरी संवेदना व्यक्त की है।

वैसे तो पासवान बिहार मूल के है लेकिन इस बिहारी बाबू ने राजनीति में कदम रखते ही भारतीय राजनीति की परिभाषा को ही बदल डाला। कहने का तात्पर्य है कि, वे हमेशा से ही कूटनीति की राजनीति से दूर ही रहे हैं। उन्होंने जीवनप्रयन्त दलितों और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आवाज़ उठायी है।

सौम्य व्यक्तित्व के धनी पासवान जी राजनीति के मैदान में ही नहीं अपितु व्यावहारिक और आपसी तौर पर भी सबके चहेते थे। कुल मिलकर ये कहना बिलकुल भी अनुचित नहीं होगा कि पासवान जी एक प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ एक साफ़ और स्वच्छ राजनीति के द्योतक भी थे।

उन्होंने अपने राजनीति करियर में देश की राजनीति को कई नए आयामों तक पहुँचाया है। बेदाग़ और निर्मल स्वाभाव के पासवान जी का निधन देश और देश की राजनीति के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। ऐसे नेता बहरतीये राजनीति में बिरले ही होते है।

पासवान जी वैसे तो सभी के अजीज़ थे लेकिन उनका लालू कुनबे से भी गहरा नाता रहा है। भले ही वे किसी भी दल के क्यूँ न रहे हों, लेकिन उनके निधन पर पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा किया गया ट्वीट कुछ और ही कहानी बयां करता है। राबड़ी देवी ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा है, ‘आदरणीय रामविलास पासवान जी के निधन से मैं बहुत दुःखी हूं. दशकों से उनके साथ पारिवारिक संबंध रहा. आज हमारे घर में चूल्हा नहीं जलेगा. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि पक्ष विपक्ष की राजनीति की इस जंग में सम्मान और आदर का ये पहलु आश्चर्य के साथ ही एक सुखद अनुभूति भी दे जाता है। अब एक छोटी सी मगर गहरी बात ज़हन में उतर जाती है और कई सवालों को जन्म देती है, वो ये कि, हमारे देश की राजनीतिक क्षेत्र में ये एक बहुत बड़ी विडम्बना रही है कि, जीवन भर आपसी कलह की दीवार अपनों को अपनों से दूर रखने में इतनी प्रबल हो जाती है कि साथ बिताए सुखद पल भी कोई मायने नहीं रखते।

ऐसा ही कुछ लालू प्रसाद यादव के परिवार और रामविलास पासवान के मध्य भी हुआ। आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं तो, लालू का कुनबा इतना शोकाकुल हो बैठा कि घर का चूल्हा तक उन्हें जलाना गंवारा ना हुआ। दरसअल, बात उन दिनों की है जब पासवान जी और लालू का परिवार सन 1977 में साथ ही दिल्ली गए थे। शुरूवात से ही दोनो परिवारों में आपसी मेल और सामंजस्य काफी गहरा था।

राजनीति की बात करें तो लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान का लंबा राजनीतिक साथ रहा है. वो बात अलग है कि ये दोनों कभी साथ रहे तो कभी एक दूसरे के खिलाफ। गौरतलब है कि, बिहार की राजनीति के तीन सबसे अहम चेहरों में से एक राम विलास पासवान के जाने से बिहार की राजनीति का एक अहम किरदार गायब हो गया है. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान बिहार की राजनीति के पिछले तीन सालों से अहम धुरी रहे हैं। आज भले ही पासवान जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन शोषित, वंचित, उत्पीड़ित वर्ग को दिए उनके योगदान को देश व समाज सदैव याद रखेगा ।


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