कारपोरेट जगत की एंट्री से डरे किसान….. जानिए मोदी सरकार पर भरोसा क्यों नहीं…….

नई दिल्ली। हाल में पारित किये गए तीन नए कृषि कानूनों का विरोध करने वाले किसानों को कई आपत्तियां हैं जिनमें से एक ये है कि इन कानूनों की आड़ में कॉर्पोरेट जगत कृषि क्षेत्र पर हावी हो जाएगा और किसानों के शोषण का खतरा पैदा हो जाएगा। लेकिन सच तो ये है कि कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट की दुनिया की एंट्री कब की हो चुकी है, लेकिन अब किसानों को लगता है कि सरकार कारपोरेट जगत को भी कृषि क्षेत्र में एंट्री की सीधी इजाजत मिल जायेगी और उनको रोकने के लिए किसानों के पास कोई उपाय शेष नहीं है।
सरकारी संस्था फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) किसानों के उत्पाद की सबसे बड़ी खरीददार है। देश में 20-25 अलग-अलग फसलों के खरीदे जाने का प्रावधान है, लेकिन एफसीआई ज्यादातर चावल और गेहूं की खरीद करती है। निजी कम्पनियों की बात करें तो इसमें सबसे बड़ी कम्पनी आईटीसी ग्रुप है। इस कम्पनी ने इस बार लगभग 22 लाख टन गेहूं देशभर के किसानों से सीधे खरीद किया। इसके अलावा महिन्द्रा ग्रुप भी कृषि क्षेत्र में काफी निवेश कर चुका है। इसके अलावा अन्य कम्पनियां जैसे नेस्ले, गोदरेज, रिलांयस, पतंजलि आदि कई कम्पनियों ने भी खाद्य उत्पादों में अच्छा खास पैसा लगा रखा है। 20 साल पहले गांवों के किसानों के लिए ई-चौपाल मॉडल तैयार किया गया था। इंटरनेट के माध्यम से किसानों को मौसम और जिंसों के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों की जानकारी दिया करते थे। जैसे सोयाबीन, सरसों आदि कई जिसों की जानकारी देते थे। हालांकि बड़ी कम्पनियां जैसे आईटीसी पहले ही किसानों से उसके उत्पाद की कीमत तय कर लेती थी। अब यह डर किसानों को सताने लगा है कि बड़े-बड़े कारपोरेट घराने धीरे-धीरे हमारी जमीनों का अधिग्रहण व ठेका पद्धति से खेती करने लगेंगे और वास्तविक किसान हाशिये पर आ जायेंगे। ई-चौपाल एक तरह से आईटीसी और किसानों के बीच कॉन्ट्रैक्ट है। जिसका प्रावधान नए कृषि कानून में है और जिसका विरोध किसान ये कह कर कर रहे हैं कि इससे अब आगे अडानी और अंबानी जैसे कॉर्पोरेट समूहों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश का खतरा है। जिस तरह से संचार क्षेत्र में सरकारी संस्थाएं निजी कम्पनियों के आने से दौड़ से बाहर हो गयी हैं और इस समय मोबाइल क्षेत्र में रिलायंस की जियो, भारती टेलीकॉम की एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया का ही कब्जा है और भारत संचार निगम लगभग बाहर होने के कगार पर है। उसी तरह कृषि क्षेत्र में भी निजी कम्पनियों का बोलबाला हो जायेगा और पहले जैसी सामतशाही राज आ जायेगा।


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