लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 115वीं जयंती पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से देश में जबरन थोपे गए आपातकाल का अंत और लोकतंत्र की बहाली का सबसे बड़ा श्रेय लोकनायक जयप्रकाश नारायण को जाता है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को नया जीवन देने वाले जयप्रकाश यानी जेपी का जन्म आज ही के दिन सन 1902 में हुआ था।

जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा से सटे एक छोटे से गांव सिताबदियारा में हुआ था। जेपी ने अपनी प्राइमरी कक्षा तक की पढ़ाई गांव में रहकर हासिल की, जिसके बाद वे आगे की शिक्षा ग्रेहणा करने हेतु पटना चले गए, जहाँ उन्होंने सातवीं कक्षा में दाखिला लिया। जेपी बचपन से ही पढ़ने लिखने में होशियार थे। जिसके चलते मेधावी छात्र जयप्रकाश को 12वीं की परीक्षा पास के बाद पटना कॉलेज के लिए स्कॉलरशिप भी मिली। जानकार बताते हैं कि, जयप्रकाश पढ़ाई के दौरान ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे और स्वदेशी सामानों का इस्तेमाल करते थे। वह हाथ से सिला कुर्ता और धोती पहनते थे।

जेपी का विवाह महज 18 साल की उम्र में सन 1920 में ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी प्रभावती से हुआ। विवाह के कुछ साल बाद ही प्रभावती ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और अहमदाबाद में गांधी आश्रम में राष्टपिता की पत्नी कस्तूरबा के साथ रहने लगीं। यही नहीं जेपी ने भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। जेपी ने पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के खिलाफ चलरे विद्रोह में शामिल हो गए थे। अंग्रेजी हुकूमत की ओर से वित्तपोषित होने की वजह से जेपी ने कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दिया और बिहार कांग्रेस की ओर से चलाए गए बिहार विद्यापीठ में एडमिशन ले लिया था।

सन 1922 में वे कैलिफोर्निया गए और ब्रार्कले में दाखिला लिया। समाजशास्त्र की पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपना खर्च वहन करने के लिए गैराज में काम किया। पढ़ाई के दौरान ही वह रूसी क्रांति और मार्क्सवाद से प्रभावित हुए। 1929 में वह एक मार्क्सवादी विचारधारा को साथ लिए अमेरिका से भारत वापस लौटे और उसी साल कांग्रेस में भी शामिल हो गए। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहे जेपी को अंग्रेजी हुकूमत ने 1932 में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

अंग्रज़ों द्वारा जेल में उन्हें काफी यातनाएं दी गईं। जेल से बाहर आने के बाद वह भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। इसी दौरान कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और जेपी इसके महासचिव बनाए गए। 1954 में उन्होंने बिहार में बिनोवा भावे के सर्वोदल आंदोलन के लिए काम करने की घोषणा की थी। 1957 में उन्होंने राजनीति छोड़ने का भी फैसला कर लिया था। हालांकि, 1960 के दशक के अंत में एक बार फिर वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे।

जानकर बताते हैं कि, जयप्रकाश नारायण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे। जिसके चलते जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इंदि‍रा गांधी को पदच्युत करने के लिए उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’नामक आंदोलन चलाया। फिर अपनी सत्ता के छिन जाने के ख़ौफ़ से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। इस दौरान विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को गिरफ़्तार कर जेल में बंद कर दिया गया और अभिव्यक्ति की आजादी को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने उस समय देश को एकजुट किया और उनके जनआंदोलन का ही परिणाम था कि करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपताकाल का ख़ात्मा हो गया।

फिर 1974 में पटना में छात्रों ने आंदोलन छेड़ा था। इस आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से अंजाम देने की शर्त पर जयप्रकाश नारायण ने अगुआई की। इसी दौरान देश में सरकार विरोधी माहौल बना तो इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी। जेपी भी जेल गए और करीब सात महीनों तक सलाखों के पीछे रहे। लेकिन जो संप्रूण क्रांति का नारा दिया, उसने देश में लोकतंत्र की बहाली दोबारा सुनिश्चित कर दी।

जेपी आंदोलन में छात्र नेता में शामिल हुए कई नेता जैसे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सुशील मोदी जैसे दर्जनों नेता बाद में वर्षों तक सत्ता में रहे। आपातकाल की लड़ाई में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था। आपातकाल के बाद देश में चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई और केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। खुद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव हार गए थे। 8 अक्टूबर 1979 को दिल की बीमारी और मधुमेह के कारण पटना में जेपी का निधन हो गया। साल 1999 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित भी किया गया था।

देश की असल आजादी के लिए ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके अथक प्रयासों और त्याग का ही फ़ल है कि आज ये देश टिका हुआ है। ऐसे ही नेताओं में शुमार लोकनायक जयप्रकाश नारायण, आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन देश की सच्ची आजादी के लिए उनके संघर्ष और बलिदान को देश और समाज जीवन भर याद रखेगा।


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