वैज्ञानिकों का दावा : नए जनरेशन इलाज़ के बाद नही पड़ेगी वैक्सीन की जरुरत

कोरोना वायरस को लेकर दुनियाभर के ज़्यादातर वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन को बनाने की कवायद में लगे हैं। इस वैश्विक महामारी को दुनिया आए हुए सात महीने से भी अधिक हो चला है और अब वैक्सीन भी लगभग तैयार हो गई है। हल ही में कोरोना वैक्सीन बनाये जाने को लेकर रूस ने दावा तो कर दिया है, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में अभी भी वैक्सीन बनाने का कार्य जारी है। वैक्सीन बनने की इस होड़ के बीच वैज्ञानिकों ने एक नए जनरेशन के इलाज़ का दावा किया है। इसके जरिए कोरोना महामारी संक्रमण की ज़द्द में आने वाले मरीजों को बीमार नहीं पड़ने दिया जाएगा और उनकी जान बचाने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा।

वैज्ञानिकों का दवा है कि, अगर इंसानों पर इस नए जनरेशन इलाज़ के नतीजे सकारात्मक आने लगेंगे तो, आने वाले साल के प्रारम्भ में ही इसे मूर्त रूप दिया जा सकता है। इस इलाज़ के जरिए लोगों को बिना सामाजिक दूरी और बिना किसी डर के घूमने-फिरने की आजादी मिल सकेगी। नए जनरेशन इलाज़ यानि कि सार्स ब्लॉक थेरेपी का इज़ात अमेरिका में किया जा रहा है और ब्रिटेन के निवेशक इसमें अपना पैसा लगा रहे हैं। इस इलाज़ को कोरोना वायरस पर आधारत सिंथेटिक प्रोटीन सीक्वेंस से बनाया जा रहा है। यह एक कॉक की तरह काम करेगा और वायरस को शरीर रिसेप्टर सेल्स में प्रवेश करने से रोकेगा। इस इलाज़ से ना सिर्फ शरीर में वायरस के प्रवेश में रोकथाम होगी, बल्कि ये कॉक वायरस की पहचान कर शरीर के इम्यून सिस्टम की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाने में कारगर साबित हो सकता है। रूस ने कोरोवा वैक्सीन का दावा किया, रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, वे इसी हफ्ते अपनी वैक्सीन को पंजीकृत करा देंगे और जल्द ही इसका अधिकांश उत्पादन भी शुरू कर देंगे।

हालांकि कई जानकारों ने रूस की वैक्सीनको स्वां के घेरे में ला दिया हैं, उनका मानना है कि रुसी वैक्सीन पर अभी इतनी भरोसा करना बेवकूफी भरा कदम साबित हो सकता है। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार , उन्हें वैक्सीन से जुड़ा कोई आधिकारिक डाटा या जानकारी रूस की ओर से नहीं मिली है। 90 से 95 फीसदी तक मददगार इस नए जनरेशन इलाज़ पर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के जानकार अध्ययन कर रहे हैं और लैब स्टडी के नतीजे प्रीप्रिंट जर्नल बायोआर्चिव में छपे थे। ऐसा माना गया है कि यह इलाज 95-100 फीसदी तक वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोकने में मददगार साबित सकता है। इसके अलावा वैज्ञानिकों का मानना है कि इस इलाज़ के बाद शायद वैक्सीन की जरूरत ही ना पड़े।


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